Tuesday, 21 April 2026

पढ़ो - सुनो

सुना है...
  काफी पढ़े लिखे हो तुम 

कभी वो भी पढ़ो 
   जो कागज की भित्ती पर
      हम लिख नहीं पाते हैं
    
कभी वो भी सुनो
    जो पलकों के पीछे से
       नयन बोल जाते है

कभी वो भी सुनो
   जो एक अन्तरंग संगीत है 
      जिसे मेरा पोर पोर गुनगुनाता है
   
अभी तक तुमने पढ़ा कि नहीं
    जो मेरे मन का प्रशान्त सागर है
      इसकी सीपियों में यादों के मोती हैं
         जिसमें तुम ही तुम हो!

Thursday, 16 April 2026

सुगंधित रंगोली

सुंगंधित रंगोली

मैं एक नाव हूँ पुरानी सी
लदी हूँ रंगबिरंगे फूलों पत्तियों से
मन्थर बहती हुई सी नदी हो तुम
बह रही हूँ सहज सरल धारा में तुम्हारी
बिन पनवार के केवल मर्जी से तुम्हारी
देखती हूँ आगे एक अन्धा मोड़ है
जानती हूँ, दिशाएँ उपदिशाएँ बदलेंगी वहाँ तुम्हारी
और पलट जाऊँगी वहीं कहीं मैं
मुझमें भरे फूल और पत्तियाँ
बना देंगे खूबसूरत सी रंगाली किनारों पर
बिखरेंगे पराग कण भी 
घुलने को तुम्हारी धार में ही
देख पाऊँगी वह दृश्य विहंगम सा
डूबने से पहले मैं
अपना समर्पण तुम्हारी अस्मिता में

रामनारायण सोनी
१७.४.२६

तुम एक आवाज थे

तुम एक आवाज थे

आवाज में तुम थे
आवाज का सफर
था वह नम सफर तरंगों का
तरंग मन में उठे स्पन्दन की
मन से मन का वह अनुनाद
अनुनाद में रंजित तुम 
और वही तुम्हारी अस्मिता
आवाज सोंख ली अन्तरिक्ष ने
पर वे स्पन्दन अमृत पी कर खड़े हैं
चल रहे हैं, चलते जा रहे हैं
तुम आस पास नहीं
शामिल ही हो इन स्पन्दनों में
घुले घुले से प्राणों में श्वास जैसे
चाँद में चाँदनी जैसे
मिसरी में मिठास जैसे

रामनारायण सोनी
१६.४.२६

Saturday, 11 April 2026

क्यों आये तुम

क्यों आये तुम

जाना ही था जिस उपवन से
उसमें पाँव धरा ही क्यों था
अपने रिसते व्रण में खुश था
तुमने लेप मला ही क्यों था
था अनजान सफर का राही
मग में दीप धरा ही क्यों था
मेरे अन्तर पट पर तुमने
अपना नाम लिखा ही क्यों था

अपनी ऊसर मिट्टी में बस
नागफनी के पौधे ही थे
उनमें उगते तीखे काँटे
नन्हे फूल भले ही थे
उपवन की क्यों चाह जगाई
प्रेम बीज फिर बीजा क्यों था
मेरे अन्तर पट पर तुमने
अपना नाम लिखा ही क्यों था

रामनारायण सोनी
११.४. २६

Tuesday, 7 April 2026

जीवन की बगिया

जीवन की बगिया !

जीवन!
नप जाए तो छोटा है
खप जाए तो खोटा है
जो चला गया, कब लौटा है
जीवन हो जो पार क्षितिज के,
रजनी पर हो भार तिमिर के
श्वास श्वास के कोमल तन में
पल्लव सहता कष्ट शिशिर के

बोलो दुष्कर जीवन हँस कर
बतलाओ किस ने काटा है?
छोड़ सुखों को, दुःख बाँटा है
जीना भी, जीवन देना भी
तप्त शिला की दीवारें हैं
ना है कोई वातायन ही
और न कोई द्वारे हैं
बीच नदी के भँवर बड़े हैं
फिसलन भरे किनारे हैं
नदिया संग संग जीवन बहता
ठहरे जो जो, हारे हैं

पगथलियाँ हैं बिंधी बिंधी सी
वाणी ठहरी, रुँधी रुँधी सी
थके बदन हैं, थके नयन हैं
आशा लतिका बँधी बँधी सी

पर आँचल में रजनी के ही
दिवस बँधे हैं छोर छोर में
कब तक तम के पाश रहेंगे
सभी गलेंगे निविड़, भोर में
फिर उत्सव और मेले होंगे
बगिया में फिर फूल खिलेंगे

रामनारायण सोनी
८.४.२६



Monday, 6 April 2026

कौन तुम ?

कौन तुम

मैं!
मैं भीड़ में, भीड़ के साथ रहता हूँ
यानी सब के साथ रहता हूँ
घर के आँगन में, चबूतरे पर-
या तुलसी के सूने में अकेले खड़े
उस पवित्र बिरवे के पास रहता हूँ
मंदिर की सीढ़ियों पर
तुम्हारे छूटे हुए पद चिन्हों के साथ रहता हूँ
घर लौटता हूँ तो वे कदम ही
अदृश्य अवस्था में साथ चलने लगते हैं
फिर मैं जहाँ भी रहता हूँ
मेरे साथ रहने लगते हैं
कभी मैं मुझको देखता हूँ
फिर वे अमिट पदछाप देखता हूँ
कभी पदचाप की मद्धिम ध्वनि सुनता हूँ
फिर उनकी गूँज, फिर अनुगूँज सुनता हूँ
पहले मैं सुनता हूँ
फिर वे ही स्पन्दित हो कर
हृदय की तन्त्रियों में समा कर
उठा कर ले जाते हैं मुझे,
वहाँ
जहाँ तुम हो, 
केवल तुम

रामनारायण सोनी
६.४.२६

Saturday, 28 March 2026

यह कैसा अहसास है

यह कैसा अहसास है?

गुलाब की 
उन सूखी पंखुड़ियों में
मैं उन उँगलियों का
मृदुल स्पर्श ढूँढता हूँ

वह कोयल भी अब
उम्र दराज हो गयी है
जो तुम्हारे सुरों के संग संग
अपनी कुहुक घोलती थी

डाल से बिछुड़ी वे सूखी पत्तियाँ भी
खरखराहट करना भूल गई हैं
जो तुम्हारे नर्म पावों को
गुदगुदाती रहती थी

ऐसे मत देखो !
वैसा मत कहो !
जैसे हो वैसे रहो !
सब सुना है उन हवाओं ने
आम्र कुंजों ने, पगडण्डियों ने
चलो ! चल कर सुनें उन पलों की
उन मधुर प्रतिध्वनियों को
बदल कर देखें
उन स्मृतियों को
अहसास में !!

रामनारायण सोनी
29.03.26

पढ़ो - सुनो

सुना है...   काफी पढ़े लिखे हो तुम  कभी वो भी पढ़ो     जो कागज की भित्ती पर       हम लिख नहीं पाते हैं      कभी वो भी सुनो     जो पलकों के ...