क्यों आये तुम
जाना ही था जिस उपवन से
उसमें पाँव धरा ही क्यों था
अपने रिसते व्रण में खुश था
तुमने लेप मला ही क्यों था
था अनजान सफर का राही
मग में दीप धरा ही क्यों था
मेरे अन्तर पट पर तुमने
अपना नाम लिखा ही क्यों था
अपनी ऊसर मिट्टी में बस
नागफनी के पौधे ही थे
उनमें उगते तीखे काँटे
नन्हे फूल भले ही थे
उपवन की क्यों चाह जगाई
प्रेम बीज फिर बीजा क्यों था
मेरे अन्तर पट पर तुमने
अपना नाम लिखा ही क्यों था
रामनारायण सोनी
११.४. २६
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