Saturday, 29 November 2025

कण कण तुम्हें पुकारे

कण कण तुम्हें पुकारे

मधुकर मन्द्र रवों से जब
वासन्ती का घूँघट खोले
कोंपल के उगने की आहट
मर्मर अपना स्वर आ घोले
  पल्लव गुमसुम पंथ निहारे
  मन का कण कण तुम्हें पुकारे

ओढ़ चाँदनी सोमप्रभा की
ललित बसन्ती लास लसे 
मधुगन्धा की चिर सौरभ ये
कलिका के कल-कंठ बसे
   विकल रागिनी बजी दुवारे
   सुभगे तेरा नाम उचारे

खिली देहरी, उर का आँगन 
पंखुड़ियों की मँडी रंगोली
रसना के मधुमय सुस्वर में
कुहुक रही कोयल अलबेली
   अमलता की बन्दनवारें
   पीत पताका झालर डारे

छर छर करता हुआ जहाँ
निर्झर का उद्यत अभिषेक
नयनों में अभिराम विकल
बूँदों का अल्हड़ अतिरेक

          रामनारायण सोनी
          २४.८.२४

Wednesday, 26 November 2025

खुले नयन से खुली दृष्टि से खुले खुले मन के वातायन
खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन 

पढ़ो - सुनो

सुना है...   काफी पढ़े लिखे हो तुम  कभी वो भी पढ़ो     जो कागज की भित्ती पर       हम लिख नहीं पाते हैं      कभी वो भी सुनो     जो पलकों के ...