मधुकर मन्द्र रवों से जब
वासन्ती का घूँघट खोले
कोंपल के उगने की आहट
मर्मर अपना स्वर आ घोले
पल्लव गुमसुम पंथ निहारे
मन का कण कण तुम्हें पुकारे
ओढ़ चाँदनी सोमप्रभा की
ललित बसन्ती लास लसे
मधुगन्धा की चिर सौरभ ये
कलिका के कल-कंठ बसे
विकल रागिनी बजी दुवारे
सुभगे तेरा नाम उचारे
खिली देहरी, उर का आँगन
पंखुड़ियों की मँडी रंगोली
रसना के मधुमय सुस्वर में
कुहुक रही कोयल अलबेली
अमलता की बन्दनवारें
पीत पताका झालर डारे
छर छर करता हुआ जहाँ
निर्झर का उद्यत अभिषेक
नयनों में अभिराम विकल
बूँदों का अल्हड़ अतिरेक
रामनारायण सोनी
२४.८.२४