Thursday, 17 July 2025

अंकुर क्या गाता है

अंकुर क्या गाता है

ओ पीपर के पीत पात
तेरे जीवन की व्यथा कथा
कैसे जग का क्षीर-सिन्धु
तूने पौरुष से रोज मथा
    नव अंकुर अपने आँसू से
    वह अकथ कथानक लिखता है

कितने प्रलयंकर झंझा के
तू क्रूर कोप से काँप था
फिर भी जीवन का मूल सत्व
तूने प्रहरी बन ढाँपा था
   नव अंकुर बन कर हरबोला
   विरुदावलि तेरी कहता है

विषबुझी पवन को पी-पी कर
फिर भी तन से अमिय बहा
जकड़न को निष्ठुर शीतों में
मन-प्राणों ने किस तरह सहा
   नव अंकुर तेरी पुण्य कथा 
   जग में गा कर बललाता है 

       रामनारायण सोनी

        १८.७.२५ 

    

Wednesday, 16 July 2025

कहीं और चल तू

कहीं और चल तू

गीत तेरे स्वर सजीले
क्यों क्षितिज से लौट आये
घन-तिमिर के धूम्र पथ में
क्षुब्ध जल से भीग आये
    जिस पुलिन में पंक भर है
    तज कहीं अब और चल तू

तृण सम्हालो नीड़ के तुम
पंख सुख- दुःख के समेटो
धूलि के उठते भ्रमर हैं
उम्र की सुधियाँ लपेटो
    झरे पल्लव शाख सूखी
    चल कहीं अब और चल तू

इस विकल सी रागिनी में
वीण भी न संग होंगी
क्रन्दनों के गाँव में सब
वीथिकाएँ तंग होंगी
    वेणुओं के रंध्र सूने
    ढूँढ ले कोई ठौर चल तू

           रामनारायण सोनी
            १७.७.२५

रुचिर रश्मियाँ

रुचिर रश्मियाँ

मैं सुमन के गर्भ से मित
रज कणों का सार ले कर
मृदुल-सौरभ-भार ले कर
   ओ सुनयने ! मधु-कलश से
   श्वास के अंतिम सिरे तक
   मधु-प्रीति का सिंचन करूँगा
  
झील के जलजात उजले
नील दल पर बिन्दु ठहरे
श्वेत मरकत से रुपहरे
   ओ प्रिये ! सब गूँथ कर मैं
   चिर अल्पना से देहरी तक
   यह मांग तारों से भरूँगा
    
वर्तिका निज शीश धरती
उर्मियाँ भर भर शिखाएँ
ज्योतिमय हैं सब दिशाएँ
    हे सुमित्रे ! अञ्जुरी भर
    महमहाती प्रीत संग संग
    शुचि रश्मियाँ अर्पण करूँगा

रामनारायण सोनी
१६.७.२५

Tuesday, 15 July 2025

रूपसी



बढ़े जब गोपद गृह की ओर
धूलिकण चले गगन की ओर
माँग में भर रोली चुपचाप
विहँसती सन्ध्या अरुणा आप
    मुखर हो उठता नीरव मौन
    हृदय- पट पर मुस्काता कौन ?

रुचिर रजनी के रंजित केश
मलय के विस्मित से उन्मेष
सांझ का उमगा सा अतिरेक
रश्मियाँ करती सी अभिषेक
    लरजती लौ से उठती रेख
    बनाती छवि मदमाती, कौन ?

मृदुल अंचल से ढाँपे दीप
विमल विधु सी आभा भर सीप
गगन में गूँजे वेणु निनाद
साँझ का तन मन भर आह्लाद
    विजन में छलक उठा यह द्रोण
    शून्य में मधुरव भरता कौन ?

रामनारायण सोनी
१४.७.२५

खाली सा संसार

खाली सा संसार

ना नींद मिली ना सपने ही
सब छूटे घर के अपने ही
यह रेलमपेल मची है ऐसी
मैं कुचली पैरों अपने ही

दीवारें चुप चुप क्यों हैं ?
दिन में भी अंधियारा घुप है
फैली बाँहें खाला खाली
अँगनाई चौबारे चुप हैं

सन्नाटे दस्तक दे कर भी
ना लौटे अपने सूने में
मैं खुद को भी ना पा पाई
अपने ही हाथों छूने में

आँचल के धागे सिसक रहे
ये स्वास हिरन से बिदक रहे
कैसे और कहाँ पुकारूँ मैं
अन्तस के छाले फफक रहे

जग सारा खारा खारा है
इसमें यह जीवन हारा है
यह टूटी आस जुड़े कैसे
इसने तन मन सब जारा है

क्यों चीख समन्दर पार करे ?
वो सिसकी में क्यों कान धरे
है उसको क्या लेना देना
पर यहाँ अधर में प्राण धरे

सपने सब अपने बेच बेच
खर्चों से अपने हाथ खेंच
सींचा था उसका रोम रोम
खूँ सभी रगों का खेंच खेंच

अपने लालन का बिरवा ही
खुद उसके बाग सजाया है
हाथ मलूँ मैं सिर धुन कर
क्या वो मेरा ही जाया है

मिट्टी मिट्टी को ताक रही
मिट्टी सोने को ढाँक रही
क्या कर लेगा आ कर भी 
जब मुट्ठी भर हो खाक रही


रामनारायण सोनी
२९.६.२५






पढ़ो - सुनो

सुना है...   काफी पढ़े लिखे हो तुम  कभी वो भी पढ़ो     जो कागज की भित्ती पर       हम लिख नहीं पाते हैं      कभी वो भी सुनो     जो पलकों के ...