गुलाब की
उन सूखी पंखुड़ियों में
मैं उन उँगलियों का
मृदुल स्पर्श ढूँढता हूँ
वह कोयल भी अब
उम्र दराज हो गयी है
जो तुम्हारे सुरों के संग संग
अपनी कुहुक घोलती थी
डाल से बिछुड़ी वे सूखी पत्तियाँ भी
खरखराहट करना भूल गई हैं
जो तुम्हारे नर्म पावों को
गुदगुदाती रहती थी
ऐसे मत देखो !
वैसा मत कहो !
जैसे हो वैसे रहो !
सब सुना है उन हवाओं ने
आम्र कुंजों ने, पगडण्डियों ने
चलो ! चल कर सुनें उन पलों की
उन मधुर प्रतिध्वनियों को
बदल कर देखें
उन स्मृतियों को
अहसास में !!
रामनारायण सोनी
29.03.26
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