Saturday, 28 March 2026

यह कैसा अहसास है

यह कैसा अहसास है?

गुलाब की 
उन सूखी पंखुड़ियों में
मैं उन उँगलियों का
मृदुल स्पर्श ढूँढता हूँ

वह कोयल भी अब
उम्र दराज हो गयी है
जो तुम्हारे सुरों के संग संग
अपनी कुहुक घोलती थी

डाल से बिछुड़ी वे सूखी पत्तियाँ भी
खरखराहट करना भूल गई हैं
जो तुम्हारे नर्म पावों को
गुदगुदाती रहती थी

ऐसे मत देखो !
वैसा मत कहो !
जैसे हो वैसे रहो !
सब सुना है उन हवाओं ने
आम्र कुंजों ने, पगडण्डियों ने
चलो ! चल कर सुनें उन पलों की
उन मधुर प्रतिध्वनियों को
बदल कर देखें
उन स्मृतियों को
अहसास में !!

रामनारायण सोनी
29.03.26

Sunday, 15 March 2026

लौटा जीवन में फिर बसन्त।।

Song version

अब उठो मित्र लो अँगड़ाई,
आशा ने चूमा दिग दिगन्त। 
दुःख का पतझड़ बीत गया
लौटा जीवन में फिर बसन्त।।  
      दुःख का पतझड़ बीत गया
      लौटा जीवन में फिर बसन्त।।  

पथ टेढ़ा मेढ़ा पंकिल हो
पर, मन उमंग से भरा रहे।
पग पग पर बाधाएँ होंगी
पर लक्ष्य नजर में धरा रहे।।
      दुःख का पतझड़ बीत गया
      लौटा जीवन में फिर बसन्त।।  

कुछ और अभी पल आयेंगे,
पग पग पर आफ़त लाएँगे।
वे अतीत के काले पन्ने
फिर फिर सब दोहराएँगे।।
      दुःख का पतझड़ बीत गया
      लौटा जीवन में फिर बसन्त।।  

कितनी उल्काएँ गिर जाएँ
हों अँधियारी रात घिरी
अपने कर्मों में पौरुष हो
किस्मत भी बनती चेरी।।
      दुःख का पतझड़ बीत गया
      लौटा जीवन में फिर बसन्त।।  

सपनों के साँचे बड़े रहें
साहस के काँधे चढ़े रहें।
पौरूष भूधर ले खड़े रहें
अपनी धरती से जुड़े रहें।।
      दुःख का पतझड़ बीत गया
      लौटा जीवन में फिर बसन्त।।  

रामनारायण सोनी
१६ .३ .२०२६

Friday, 13 March 2026

आशा

आशा 

यदि पा न सका मैं तुमको 
तो खो भी तुम्हें कहाँ पाया
इन अश्रु भरी आंखों से वो
खार कभी ना धुल पाया
इन पलकों पर जागा सपना
अपना वह हो न कभी पाया
तुमको चाहा इतना, इतना 
जैसे तन से, तन की छाया
      यदि पा न सका मैं तुमको 
      तो खो भी तुम्हें कहाँ पाया

इस पार मृदुल मन कोने में
आहों का अनल पिपासु है
इस पार गहन से दरिया के
गलता, रहता बस आँसू है
दिन रात गले जब मिलते हैं
लाली लोचन में भर जाती
फिर साँझ प्रतीक्षा की अपनी
चिर प्यास देहरी धर जाती
      यदि पा न सका मैं तुमको 
      तो खो भी तुम्हें कहाँ पाया

सीमित करते हैं युग युग से
प्रबल क्षितिज के बाहु पाश
इनने ही लूटे हैं प्रिय के
अपने जो क्षण थे वे हुलास
लौटी रजनी भी, चन्दा भी
लौटा मधुमास मधुर वन में
पर, इनसे और जगी ज्वाला
आशा के मेरे उपवन में
      यदि पा न सका मैं तुमको 
      तो खो भी तुम्हें कहाँ पाया

रामनारायण सोनी
१३.३. २०२६

Wednesday, 4 March 2026

तुम न आये

Revised

हे सखी मधुमास आया
पर अभी तक तुम न आये

शरद बीती, शीत भागी
जा चुकी ठिठुरी हवाएँ
मधुपरी में प्यास जागी
संदली होती फिजाएँ
सांझ जागी, रात जागी।
       जुड़ भ्रमर के वृन्द आये।
       पर अभी तक तुम न आये।।

प्रीत के पाहुन मुखर 
हो चले हैं फिर बटोही
इन अलिन्दों के नगर में
प्यार की रस-गन्ध जागी
सुप्त कलिका के अधर में
पुष्प की अभिलाष जागी
        योगिनी ने छन्द गाये
        पर अभी तक तुम न आये।।

हर दिशा हर कोण में है
खुशबुओं के मस्त मेले
केतकी, कचनार के सँग
मस्तियों नें फाग खेले
हर लता की बाँह फैली
हर विटप की पीर भागी।
          प्रेमियों के मन लुभाये
          पर अभी तक तुम न आये।।

कोकिला के कंठ जागे
वीतरागी पुष्प जागे 
वीण में भर रागिनी के
मौन थे, गन्धर्व जागे
जो न जागे वे अभागे
मीन की फिर आस जागी।
         बेलियों के छत्र छाये 
         पर अभी तक तुम न आये।।

फाल्गुनी के उत्सवों में
प्रीत का मधुरास जागा
वेणु के स्वर, ताल में लय
टेसुओं में अनल जागा
गोप वृन्दों सँग सकारे
सुर मुखर धर धेनु जागी।
         भोर अरुणिम अश्व लाये 
         पर अभी तक तुम न आये।।


     रामनारायण सोनी
             25.11.20
                        

पढ़ो - सुनो

सुना है...   काफी पढ़े लिखे हो तुम  कभी वो भी पढ़ो     जो कागज की भित्ती पर       हम लिख नहीं पाते हैं      कभी वो भी सुनो     जो पलकों के ...