आवाज में तुम थे
आवाज का सफर
था वह नम सफर तरंगों का
तरंग मन में उठे स्पन्दन की
मन से मन का वह अनुनाद
अनुनाद में रंजित तुम
और वही तुम्हारी अस्मिता
आवाज सोंख ली अन्तरिक्ष ने
पर वे स्पन्दन अमृत पी कर खड़े हैं
चल रहे हैं, चलते जा रहे हैं
तुम आस पास नहीं
शामिल ही हो इन स्पन्दनों में
घुले घुले से प्राणों में श्वास जैसे
चाँद में चाँदनी जैसे
मिसरी में मिठास जैसे
रामनारायण सोनी
१६.४.२६
No comments:
Post a Comment