मैं!
मैं भीड़ में, भीड़ के साथ रहता हूँ
यानी सब के साथ रहता हूँ
घर के आँगन में, चबूतरे पर-
या तुलसी के सूने में अकेले खड़े
उस पवित्र बिरवे के पास रहता हूँ
मंदिर की सीढ़ियों पर
तुम्हारे छूटे हुए पद चिन्हों के साथ रहता हूँ
घर लौटता हूँ तो वे कदम ही
अदृश्य अवस्था में साथ चलने लगते हैं
फिर मैं जहाँ भी रहता हूँ
मेरे साथ रहने लगते हैं
कभी मैं मुझको देखता हूँ
फिर वे अमिट पदछाप देखता हूँ
कभी पदचाप की मद्धिम ध्वनि सुनता हूँ
फिर उनकी गूँज, फिर अनुगूँज सुनता हूँ
पहले मैं सुनता हूँ
फिर वे ही स्पन्दित हो कर
हृदय की तन्त्रियों में समा कर
उठा कर ले जाते हैं मुझे,
वहाँ
जहाँ तुम हो,
केवल तुम
रामनारायण सोनी
६.४.२६
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