Tuesday, 27 January 2026

 सम्बोधन में केवल 'प्रिय' ही और अन्त में 'प्रिया' लिखा था

इन दोनों के मध्य पत्र में मुझको खाली स्थान दिखा था।।

पहले तो समझा जल्दी में तुम कुछ हाल नहीं लिख पाए।

या फिर कलम पुरानी होगी सूख गया होगा मन हाए।।

या फिर लिखने लायक कुछ भी तुमको नहीं लगा होगा।

अन्तर में मेरे प्रति कोई सोया भाव जगा ना होगा।।


 अलट पलट कर देखा जब तो पीछे नोट लिखा पाया।

'तुम' से हो कर शुरू पत्र यह, 'मुझ' तक यूँ ही नहीं आया।।

ऊपर खुद तारीख लिखो और पीछे पता स्वयं का लिखना।

बीच प्रिया और प्रिय के, अपने बीच घटा था वह लिखना।।

मैं उन खट्टे मीठे पल को फिर से दोहराने आऊँगी।

गीत लिखे जो तुमने मुझ पर तुम्हें सुनाने आऊँगी।।


 फिर से जब पलटा खत उसमें तो तुम ही चित्रलिखे थे।

चारु चपल चितवन मुखड़े पर अधरों पर मुस्कान लिए थे।।

अरुण कपोलों पर कुन्तल की लट कुछ यूँ सँवरी थी।

कोरे कागज की धरती पर तुम छाया बन उभरी थी।।

फिर तो यादों की बरात हृदय के तल पर ऐसे आ उतरी।

जैसे बोराये उपवन में सौ सौ मधुऋतुएँ खुद आ पसरी।।


तब से अब तक मैं प्रतिदिन मुझ को पत्र नया लिखती हूँ।

अपनी कलम पुरानी यादें बिना मोल के मैं बिकती हूँ।।

नाव मेरी कागज की है यह प्रबल प्रेम के सागर उतरी।

अब झंझा कितने ही आवें फिकर सभी की है बिसरी।।

संदेशों के खालीपन में हर दिन नगर नया बसता है।

मेरे मन के पागलपन पे यह सारा जग ही हँसता  है।।

चल चलें मनमीत, 

फिर समय की कोख से

पल सुनहले ढूढ़ लाएं बिसरे 


याद के आगोश में

स्वप्न के सागर तले कुछ 

सीपियाँ है पल रही मोती भरी

आओ! पल सुनहले ढूढ़ लाएं बिसरे


उस सरोवर के किनारे

सख्त सी चट्टान पर

रेशमी सपने सहेजे ताल में

झिलमिलाती बर्क सी थी चांदनी

मन लगाये पंख उड़ता व्योम में,

वो सरोवर, वो शिला, वे विहग वो चांदनी

सब वहीं है देखता कोई नहीं है

ए सुनो मनमीत मेरे !

जोहती है बाट वह चट्टान अविरल

आओ फिर ढूंढें उन्हें

हमसे जो बिसरे सुनहले पल,

पल सुनहले ढूढ़ लाएं बिसरे ।। १ ।।


भग्न सी दीवार पर की  खूँटियाँ

चंचुओं से खेलती जिन पर गोरैया

चहचहाती, फरफराती थी जहाँ

नीड़ भी दिखता नहीं कोई यहाँ

दूर तक कोई न कलरव भासता

वो मुँडेरें, कोटरें, 

हैं पड़ी बेजान अब

जोहती है खूँटियाँ वे बाट अविरल 

ए सुनो मनमीत मेरे !

पल सुनहले ढूढ़ लाएं ।। २  ।।


सूर्य की उगती सुनहली रश्मियाँ

व्योम था सुंदर विहंगों से भरा

तुम लरजते थे दिखा कर ये समां

उत्स उपवन में बिखरता मद भरा 

बस अलसते मौन को तब थी जगाती 

लालिमा मुख पर लपेटे कुन्द सी

घनघनाते घंटियों के सुर सुनाती,

ओस पीती सी गुलाबी पंखुरी

तुम लजाती फूल भर भर अंजुरी;

वो किरण, वो प्रभाती, नभ; 

अब सभी निष्प्राण हैं 

जोहती है बाट उन्मन रश्मि अविरल ।।

ए सुनो मनमीत मेरे !

पल सुनहले ढूढ़ लाएं  


वे कुहकती कोयले निस्पंद हैं क्यों 

क्यों पपीहे अब प्रवासी हो गए 

आचमन करती वो मुनमुन तितलियाँ 

पुष्प जिनकी कर रहा है चिर-प्रतीक्षा 

डाल कर गलहार करती मदभरी 

मंद सी मुस्कान, मस्ती, कुलबुली 

सब्ज अधरों से मुखरती बतकही 

सब कहीं धर कर बिसरती क्यों अरी!!

वो पपीहा,कोयलें, अमराइयाँ, वो चमन,

बांह फैलाये खड़ा वट वृक्ष है 

जोहती है बाट मेरी दृष्टि अविरल ।।

ए सुनो मनमीत मेरे !

पल सुनहले ढूढ़ लाएं 


मेघ बनकर मेखला उन तक जुड़े 

सींचते थे भावना के गाँव को 

सौंधियाती मिट्टियों की खुश्बुएं

दौड़ती इस छोर से उस छोर तक 

चाँद में प्रतिबिम्ब बनता चाँद मेरा 

याद है सब  रास्ते पगडंडियाँ; 

वे सितारे, वो गगन, वे बादलों की बस्तियाँ 

वे नज़ारे, वादियां तो सब यहीं है 

जोहती है बाट प्रिय की आस अविरल ।। १ ।।

ए सुनो मनमीत मेरे !

पल सुनहले ढूढ़ लाएं बिसरे 

हमसे जो बिसरे सुनहले पल

याद के आगोश में

स्वप्न के सागर तले कुछ 

सीपियाँ है पल रही मोती भरी

आओ! पल सुनहले ढूढ़ लाएं बिसरे


याद के आगोश में

स्वप्न के सागर तले कुछ 

सीपियाँ है पल रही मोती भरी

आओ! पल सुनहले ढूढ़ लाएं बिसरे


पढ़ो - सुनो

सुना है...   काफी पढ़े लिखे हो तुम  कभी वो भी पढ़ो     जो कागज की भित्ती पर       हम लिख नहीं पाते हैं      कभी वो भी सुनो     जो पलकों के ...