Wednesday, 16 July 2025

रुचिर रश्मियाँ

रुचिर रश्मियाँ

मैं सुमन के गर्भ से मित
रज कणों का सार ले कर
मृदुल-सौरभ-भार ले कर
   ओ सुनयने ! मधु-कलश से
   श्वास के अंतिम सिरे तक
   मधु-प्रीति का सिंचन करूँगा
  
झील के जलजात उजले
नील दल पर बिन्दु ठहरे
श्वेत मरकत से रुपहरे
   ओ प्रिये ! सब गूँथ कर मैं
   चिर अल्पना से देहरी तक
   यह मांग तारों से भरूँगा
    
वर्तिका निज शीश धरती
उर्मियाँ भर भर शिखाएँ
ज्योतिमय हैं सब दिशाएँ
    हे सुमित्रे ! अञ्जुरी भर
    महमहाती प्रीत संग संग
    शुचि रश्मियाँ अर्पण करूँगा

रामनारायण सोनी
१६.७.२५

No comments:

Post a Comment

पढ़ो - सुनो

सुना है...   काफी पढ़े लिखे हो तुम  कभी वो भी पढ़ो     जो कागज की भित्ती पर       हम लिख नहीं पाते हैं      कभी वो भी सुनो     जो पलकों के ...