मैं सुमन के गर्भ से मित
रज कणों का सार ले कर
मृदुल-सौरभ-भार ले कर
ओ सुनयने ! मधु-कलश से
श्वास के अंतिम सिरे तक
मधु-प्रीति का सिंचन करूँगा
झील के जलजात उजले
नील दल पर बिन्दु ठहरे
श्वेत मरकत से रुपहरे
ओ प्रिये ! सब गूँथ कर मैं
चिर अल्पना से देहरी तक
यह मांग तारों से भरूँगा
वर्तिका निज शीश धरती
उर्मियाँ भर भर शिखाएँ
ज्योतिमय हैं सब दिशाएँ
हे सुमित्रे ! अञ्जुरी भर
महमहाती प्रीत संग संग
शुचि रश्मियाँ अर्पण करूँगा
रामनारायण सोनी
१६.७.२५
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