मैं एक नाव हूँ पुरानी सी
लदी हूँ रंगबिरंगे फूलों पत्तियों से
मन्थर बहती हुई सी नदी हो तुम
बह रही हूँ सहज सरल धारा में तुम्हारी
बिन पनवार के केवल मर्जी से तुम्हारी
देखती हूँ आगे एक अन्धा मोड़ है
जानती हूँ, दिशाएँ उपदिशाएँ बदलेंगी वहाँ तुम्हारी
और पलट जाऊँगी वहीं कहीं मैं
मुझमें भरे फूल और पत्तियाँ
बना देंगे खूबसूरत सी रंगाली किनारों पर
बिखरेंगे पराग कण भी
घुलने को तुम्हारी धार में ही
देख पाऊँगी वह दृश्य विहंगम सा
डूबने से पहले मैं
अपना समर्पण तुम्हारी अस्मिता में
रामनारायण सोनी
१७.४.२६
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