गीत तेरे स्वर सजीले
क्यों क्षितिज से लौट आये
घन-तिमिर के धूम्र पथ में
क्षुब्ध जल से भीग आये
जिस पुलिन में पंक भर है
तज कहीं अब और चल तू
तृण सम्हालो नीड़ के तुम
पंख सुख- दुःख के समेटो
धूलि के उठते भ्रमर हैं
उम्र की सुधियाँ लपेटो
झरे पल्लव शाख सूखी
चल कहीं अब और चल तू
इस विकल सी रागिनी में
वीण भी न संग होंगी
क्रन्दनों के गाँव में सब
वीथिकाएँ तंग होंगी
वेणुओं के रंध्र सूने
ढूँढ ले कोई ठौर चल तू
रामनारायण सोनी
१७.७.२५
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