Wednesday, 16 July 2025

कहीं और चल तू

कहीं और चल तू

गीत तेरे स्वर सजीले
क्यों क्षितिज से लौट आये
घन-तिमिर के धूम्र पथ में
क्षुब्ध जल से भीग आये
    जिस पुलिन में पंक भर है
    तज कहीं अब और चल तू

तृण सम्हालो नीड़ के तुम
पंख सुख- दुःख के समेटो
धूलि के उठते भ्रमर हैं
उम्र की सुधियाँ लपेटो
    झरे पल्लव शाख सूखी
    चल कहीं अब और चल तू

इस विकल सी रागिनी में
वीण भी न संग होंगी
क्रन्दनों के गाँव में सब
वीथिकाएँ तंग होंगी
    वेणुओं के रंध्र सूने
    ढूँढ ले कोई ठौर चल तू

           रामनारायण सोनी
            १७.७.२५

No comments:

Post a Comment

पढ़ो - सुनो

सुना है...   काफी पढ़े लिखे हो तुम  कभी वो भी पढ़ो     जो कागज की भित्ती पर       हम लिख नहीं पाते हैं      कभी वो भी सुनो     जो पलकों के ...