जीवन की बगिया !
जीवन!
नप जाए तो छोटा है
खप जाए तो खोटा है
जो चला गया, कब लौटा है
जीवन हो जो पार क्षितिज के,
रजनी पर हो भार तिमिर के
श्वास श्वास के कोमल तन में
पल्लव सहता कष्ट शिशिर के
बोलो दुष्कर जीवन हँस कर
बतलाओ किस ने काटा है?
छोड़ सुखों को, दुःख बाँटा है
जीना भी, जीवन देना भी
तप्त शिला की दीवारें हैं
ना है कोई वातायन ही
और न कोई द्वारे हैं
बीच नदी के भँवर बड़े हैं
फिसलन भरे किनारे हैं
नदिया संग संग जीवन बहता
ठहरे जो जो, हारे हैं
पगथलियाँ हैं बिंधी बिंधी सी
वाणी ठहरी, रुँधी रुँधी सी
थके बदन हैं, थके नयन हैं
आशा लतिका बँधी बँधी सी
पर आँचल में रजनी के ही
दिवस बँधे हैं छोर छोर में
कब तक तम के पाश रहेंगे
सभी गलेंगे निविड़, भोर में
फिर उत्सव और मेले होंगे
बगिया में फिर फूल खिलेंगे
रामनारायण सोनी
८.४.२६
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