यदि पा न सका मैं तुमको
तो खो भी तुम्हें कहाँ पाया
इन अश्रु भरी आंखों से वो
खार कभी ना धुल पाया
इन पलकों पर जागा सपना
अपना वह हो न कभी पाया
तुमको चाहा इतना, इतना
जैसे तन से, तन की छाया
यदि पा न सका मैं तुमको
तो खो भी तुम्हें कहाँ पाया
इस पार मृदुल मन कोने में
आहों का अनल पिपासु है
इस पार गहन से दरिया के
गलता, रहता बस आँसू है
दिन रात गले जब मिलते हैं
लाली लोचन में भर जाती
फिर साँझ प्रतीक्षा की अपनी
चिर प्यास देहरी धर जाती
यदि पा न सका मैं तुमको
तो खो भी तुम्हें कहाँ पाया
सीमित करते हैं युग युग से
प्रबल क्षितिज के बाहु पाश
इनने ही लूटे हैं प्रिय के
अपने जो क्षण थे वे हुलास
लौटी रजनी भी, चन्दा भी
लौटा मधुमास मधुर वन में
पर, इनसे और जगी ज्वाला
आशा के मेरे उपवन में
यदि पा न सका मैं तुमको
तो खो भी तुम्हें कहाँ पाया
रामनारायण सोनी
१३.३. २०२६
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