Sunday, 15 March 2026

लौटा जीवन में फिर बसन्त।।

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अब उठो मित्र लो अँगड़ाई,
आशा ने चूमा दिग दिगन्त। 
दुःख का पतझड़ बीत गया
लौटा जीवन में फिर बसन्त।।  
      दुःख का पतझड़ बीत गया
      लौटा जीवन में फिर बसन्त।।  

पथ टेढ़ा मेढ़ा पंकिल हो
पर, मन उमंग से भरा रहे।
पग पग पर बाधाएँ होंगी
पर लक्ष्य नजर में धरा रहे।।
      दुःख का पतझड़ बीत गया
      लौटा जीवन में फिर बसन्त।।  

कुछ और अभी पल आयेंगे,
पग पग पर आफ़त लाएँगे।
वे अतीत के काले पन्ने
फिर फिर सब दोहराएँगे।।
      दुःख का पतझड़ बीत गया
      लौटा जीवन में फिर बसन्त।।  

कितनी उल्काएँ गिर जाएँ
हों अँधियारी रात घिरी
अपने कर्मों में पौरुष हो
किस्मत भी बनती चेरी।।
      दुःख का पतझड़ बीत गया
      लौटा जीवन में फिर बसन्त।।  

सपनों के साँचे बड़े रहें
साहस के काँधे चढ़े रहें।
पौरूष भूधर ले खड़े रहें
अपनी धरती से जुड़े रहें।।
      दुःख का पतझड़ बीत गया
      लौटा जीवन में फिर बसन्त।।  

रामनारायण सोनी
१६ .३ .२०२६

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