हे सखी मधुमास आया
पर अभी तक तुम न आये
शरद बीती, शीत भागी
जा चुकी ठिठुरी हवाएँ
मधुपरी में प्यास जागी
संदली होती फिजाएँ
सांझ जागी, रात जागी।
जुड़ भ्रमर के वृन्द आये।
पर अभी तक तुम न आये।।
प्रीत के पाहुन मुखर
हो चले हैं फिर बटोही
इन अलिन्दों के नगर में
प्यार की रस-गन्ध जागी
सुप्त कलिका के अधर में
पुष्प की अभिलाष जागी
योगिनी ने छन्द गाये
पर अभी तक तुम न आये।।
हर दिशा हर कोण में है
खुशबुओं के मस्त मेले
केतकी, कचनार के सँग
मस्तियों नें फाग खेले
हर लता की बाँह फैली
हर विटप की पीर भागी।
प्रेमियों के मन लुभाये
पर अभी तक तुम न आये।।
कोकिला के कंठ जागे
वीतरागी पुष्प जागे
वीण में भर रागिनी के
मौन थे, गन्धर्व जागे
जो न जागे वे अभागे
मीन की फिर आस जागी।
बेलियों के छत्र छाये
पर अभी तक तुम न आये।।
फाल्गुनी के उत्सवों में
प्रीत का मधुरास जागा
वेणु के स्वर, ताल में लय
टेसुओं में अनल जागा
गोप वृन्दों सँग सकारे
सुर मुखर धर धेनु जागी।
भोर अरुणिम अश्व लाये
पर अभी तक तुम न आये।।
रामनारायण सोनी
25.11.20
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