होंगे वे कोई और जिन्हे यह
प्रेम भी इक अनुबन्ध लगा
मुझे गगन से पुण्य धरा सा
यह अटूट है सम्बन्ध लगा
मुझमें तुम हो, तुम में मैं हूँ
मिसरी जल में ज्यों घुल जाए
खोजा हमने भरसक लेकिन
खुद को खुद में ढूँढ न पाए
खोलें तट से नाव बँधी जो
बैठ धार में आ चल बह लें
खोल किवारे अन्तर्मन के
जग को भूलें, मन को छूलें
रामनारायण सोनी
२६.९ . २५
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