खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन
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पढ़ो - सुनो
सुना है... काफी पढ़े लिखे हो तुम कभी वो भी पढ़ो जो कागज की भित्ती पर हम लिख नहीं पाते हैं कभी वो भी सुनो जो पलकों के ...
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कहीं और चल तू गीत तेरे स्वर सजीले क्यों क्षितिज से लौट आये घन-तिमिर के धूम्र पथ में क्षुब्ध जल से भीग आये जिस पुलिन में पंक भर है तज...
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रुचिर रश्मियाँ मैं सुमन के गर्भ से मित रज कणों का सार ले कर मृदुल-सौरभ-भार ले कर ओ सुनयने ! मधु-कलश से श्वास के अंतिम सिरे तक मधु-प...
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कौन तुम मैं! मैं भीड़ में, भीड़ के साथ रहता हूँ यानी सब के साथ रहता हूँ घर के आँगन में, चबूतरे पर- या तुलसी के सूने में अकेले खड़े उस पवित्र...
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