खाली सा संसार
ना नींद मिली ना सपने ही
सब छूटे घर के अपने ही
यह रेलमपेल मची है ऐसी
मैं कुचली पैरों अपने ही
दीवारें चुप चुप क्यों हैं ?
दिन में भी अंधियारा घुप है
फैली बाँहें खाला खाली
अँगनाई चौबारे चुप हैं
सन्नाटे दस्तक दे कर भी
ना लौटे अपने सूने में
मैं खुद को भी ना पा पाई
अपने ही हाथों छूने में
आँचल के धागे सिसक रहे
ये स्वास हिरन से बिदक रहे
कैसे और कहाँ पुकारूँ मैं
अन्तस के छाले फफक रहे
जग सारा खारा खारा है
इसमें यह जीवन हारा है
यह टूटी आस जुड़े कैसे
इसने तन मन सब जारा है
क्यों चीख समन्दर पार करे ?
वो सिसकी में क्यों कान धरे
है उसको क्या लेना देना
पर यहाँ अधर में प्राण धरे
सपने सब अपने बेच बेच
खर्चों से अपने हाथ खेंच
सींचा था उसका रोम रोम
खूँ सभी रगों का खेंच खेंच
अपने लालन का बिरवा ही
खुद उसके बाग सजाया है
हाथ मलूँ मैं सिर धुन कर
क्या वो मेरा ही जाया है
मिट्टी मिट्टी को ताक रही
मिट्टी सोने को ढाँक रही
क्या कर लेगा आ कर भी
जब मुट्ठी भर हो खाक रही
रामनारायण सोनी
२९.६.२५
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