बढ़े जब गोपद गृह की ओर
धूलिकण चले गगन की ओर
माँग में भर रोली चुपचाप
विहँसती सन्ध्या अरुणा आप
मुखर हो उठता नीरव मौन
हृदय- पट पर मुस्काता कौन ?
रुचिर रजनी के रंजित केश
मलय के विस्मित से उन्मेष
सांझ का उमगा सा अतिरेक
रश्मियाँ करती सी अभिषेक
लरजती लौ से उठती रेख
बनाती छवि मदमाती, कौन ?
मृदुल अंचल से ढाँपे दीप
विमल विधु सी आभा भर सीप
गगन में गूँजे वेणु निनाद
साँझ का तन मन भर आह्लाद
विजन में छलक उठा यह द्रोण
शून्य में मधुरव भरता कौन ?
रामनारायण सोनी
१४.७.२५
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