Tuesday, 15 July 2025

रूपसी



बढ़े जब गोपद गृह की ओर
धूलिकण चले गगन की ओर
माँग में भर रोली चुपचाप
विहँसती सन्ध्या अरुणा आप
    मुखर हो उठता नीरव मौन
    हृदय- पट पर मुस्काता कौन ?

रुचिर रजनी के रंजित केश
मलय के विस्मित से उन्मेष
सांझ का उमगा सा अतिरेक
रश्मियाँ करती सी अभिषेक
    लरजती लौ से उठती रेख
    बनाती छवि मदमाती, कौन ?

मृदुल अंचल से ढाँपे दीप
विमल विधु सी आभा भर सीप
गगन में गूँजे वेणु निनाद
साँझ का तन मन भर आह्लाद
    विजन में छलक उठा यह द्रोण
    शून्य में मधुरव भरता कौन ?

रामनारायण सोनी
१४.७.२५

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